तुझे नहीं पता की मैं कौन हूँ
कभी दीखता आशिक़ कभी दिकथा मदहोश हूँ
ना कर उम्मीद पता करने की मैं कौन हूँ
कभी पवन का एक झोंका हूँ
जो उड़ते संग ले जाता हूँ बहार को
संग ले चलू दर्द और तन्हाई को
ना बहार रोक पाई थी हमे ना बादल रोक पाएंगे ….
ये हवा हैं जिसको कोई ना बाँध पाया हैं
मंन और सोच को भी ना कोई रोख पाया हैं
वह सब संग ले आते हैं और सब ले जाते हैं
दर्द हो या मुस्कान साथ में कभी ख़ुशी और आँसू
और एक लम्हा छोड़ जाते हैं …
एक अकेली शाम सोचता हूँ यूँही…